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बाल विकास

बाल विकास



विकास की अवधारणा

विकास की अवधारणा विकास की प्रक्रिया एक अविरल क्रमिक तथा सतत प्रक्रिया होती है | विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक, क्रियात्मक, संज्ञानात्मक, भाषागत, संवेगात्मक एवं सामजिक विकास होता है | विकास की प्रक्रिया में रुचियों, आदतों, द्रष्टिकोकणों, जीवन-मूल्यों, स्वभाव, व्यक्तिगत, व्यवहार इत्यादि का विकास भी शामिल है |
बल विकास का तात्पर्य- है- बालक के विकास की प्रकिया | बालक के विकास की प्रक्रिया उसके जन्म से पूर्व गर्भ में ही प्रारम्भ हो जाती है | विकास की इस प्रक्रिया में वः गर्भवस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, प्रोढ़ावस्था इत्यादि कई अवस्थाओ से गुजरते हुए परिपक्वता की स्तिथि प्राप्त करता है |

बल विकास के अध्ययन में प्राय: निम्नलिखित बातो को शामिल किया जाता है |

  1. जन्म लेने से पूर्व एवं जन्म लेने के बाद परिपक्व होने तक बालक में किस प्रकार के परिवर्तन होते है ?
  2. बालक में होने वाले परिवर्तनों का विशेष आयु के साथ क्या सम्बन्ध होता है ?
  3. आयु के साथ होने वाले परिवर्तनों का क्या स्वरूप होता है ?
  4. बालको में होने वाले उपरोक्त परिवर्तनों के लिए कौन-से कारक जिम्मेदार होते है ?
  5. बालक में समय-समय पर होने वाले उपरोक्त परिवर्तन उसके व्यवहार को किस प्रकार से प्रभावित करते है ?
  6. क्या पिछले परिवर्तनों के आधार पर बालक में भविष्य में होने वाले गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तनों की भविष्यवाणी की जा सकती है ?
  7. क्या सभी बालको में वृद्धि एवं विकास सम्बन्धी परिवर्तनों का स्वरूप एक जैसा होता है अथवा व्यक्तिगत विभिन्नता के अनुरूप इनमे अंतर होता है ?
  8. बालको में पाए जाने वाले व्यक्तिगत विभिनताओ के लिए किस प्रकार के आनुवंशिक एवं परिवेशजन्य प्रभाव उत्तरदायी होते है ?
  9. बालक के गर्भ में आने के बाद निरंतर प्रगति होती रहती है | इस प्रगति का विभिन्न आयु तथा अवस्था विशेष में क्या स्वरूप होता है ?
  10. बालक की रुचियों, आदतों, द्रष्टिकोणों, जीवन-मूल्यों, स्वभाव तथा उच्च व्यक्तिगत एवं व्यवहार-गुणों में जन्म के समय से ही जो निरन्तर परिवर्तन आते रहते है उनका विभिन्न आयु वर्ग तथा अवस्था विशेष में क्या स्वरूप होता है तथा इस परिवर्तन की प्रक्रिया की क्या प्रक्रति होती है |

वृद्धि एवं विकास में अंतर

वृद्धि एवं विकास का प्रयोग लोग प्राय: प्रयावाची शब्दों के रूप में करते है | अवधारणात्मक रूप से देखा जाये, तो इन दोने में अन्तर होता है | इस अन्तर को हम अग्र प्रकार से व्यक्त कर सकते है |
वृद्धि
1.वृद्धि शब्द का प्रयोग परिमाणात्मक परिवर्तनों; जैसे-बच्चे के बड़े होने के साथ उसके आकार, लम्बाई, ऊंचाई, इत्यादि के लिए होता है |
2. वृद्धि विकास की प्रक्रिया एक चरण होता है | इसका क्षेत्र सिमित होता है
3. वृद्धि की क्रिया आजीवन नही चलती, बालक के परिपक्व होने के साथ ही यह रुक जाती है
4. बालक की शारीरिक वृद्धि हो रही है इसका अर्थ यह नही हो सकता की उसमे विकास भी हो रहा है |
विकास
विकास शब्द का प्रयोग परिमाणात्मक परिवर्तनों के साथ साथ व्यावहारिक परिवर्तनों, जैसे-कार्यकुशलता, कार्यक्षमता, व्यवहार में सुधर इत्यादि के लिए भी होता है |
विकास अपने आप में एक विस्तृत अर्थ रखता है | वृद्धि इसका एक भाग होता है |
विकास एक सतत प्रक्रिया है | बालक के परिपक्व होने के बाद भी यह चलती रहती है |
बालक में विकास के लिए भी वृद्धि आवश्यक नही है |


मानव विकास की अवस्थाएँ

मानव विकास एक सतत प्रक्रिया है | शारीरिक विकास तो एक सीमा (परिपक्वता प्राप्त करने) के बाद रुक जाता है, किन्तु मनोशारीरिक क्रियाओ में विकास निरन्तर होता रहता है | इन मनोशारीरिक क्रियाओ के अन्तर्गत मानसिक, भाषायी, संवेगात्मक, सामाजिक एवं चारित्रिक विकास आते है | इनका विकास विभिन्न आयु स्तरों में भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है | इन आयु स्तरों को मानव विकास की अवस्थाएँ कहते है | भारतीय मनीषियों ने विकास की अवस्थाओ को सात कालो में विभाजित किया है |
  1. गर्भवस्था गर्भधान से जन्म तक ?
  2. शैशवावस्था जन्म से 5 वर्ष तक |
  3. बाल्यावस्था 5 वर्ष से 12 वर्ष तक |
  4. किशोरावस्था 12 वर्ष से 18 वर्ष तक |
  5. युवावस्था 18 वर्ष से 25 वर्ष तक |
  6. प्रौढ़ावस्था 25 वर्ष से 55 वर्ष तक |
  7. वृद्धावस्था 55 वर्ष से म्रत्यु तक |

इस समय अधिकतर विद्वान् मानव विकास का अध्ययन निम्नलिखित चार अवस्थाओ के अन्तर्गत करते है

  1. शैशवावस्था जन्म से 6 वर्ष तक |
  2. बाल्यावस्था 6 वर्ष से 12 वर्ष तक |
  3. किशोरावस्था 12 वर्ष से 55 वर्ष तक |
  4. वयस्कावस्था 18 वर्ष से म्रत्यु तक |
शिक्षा की द्रष्टि से प्रथम तीन अवस्थाएँ महत्त्वपूर्ण है, इसलिए मनोविज्ञान में इन्ही तीन अवस्थाओ में होने वाले मानव विकास का अध्ययन किया जाता है |

शैशवावस्था

जन्म से 6 वर्ष तक की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है | इनमे जन्म से 3 वर्ष तक बच्चो का शारीरिक एवं मानसिक विकास तेजी से होता है | शैशवावस्था में अनुकरण एवं दोहराने की तिर्व प्रवत्ति बच्चो में पाई जाती है | इस काल में बच्चो का समाजीकरण भी प्रारम्भ हो जाता है | इस काल में जिज्ञासा की तीव्र प्रवत्ति बच्चो में पाई जाती है | मनोवैज्ञानिको की द्रष्टि से यह काल भाषा सिखने की सर्वोत्तम अवस्था है | इन्ही सब कारणों से यह काल शिक्षा की द्रष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है |

बाल्यावस्था

6 वर्ष से 12 वर्ष तक की अवस्था को बाल्यावस्था कहा जाता है | बाल्यावस्था के प्रथम चरण 6 से 9 वर्ष में बालको की लम्बाई एवं भार दोनों बढ़ते है | इस काल में बच्चो में चिन्तन एवं तर्क शक्तियों का विकास हो जाता है | इस काल के बाद से बच्चे पढ़ाई में रूचि लेने लगते है | शैशवावस्था में बच्चे जहाँ भुत तीव्र गति से सीखते है वही बाल्यावस्था में सीखने की गति मन्द हो जाती है, किन्तु उनके सिखने का क्षेत्र शैशवावस्था की तुलना में विस्तृत हो जाता है | मनोवैज्ञानिको की द्रष्टि से इस अवस्था में बच्चो की शिक्षा के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग करना चाहिये |
किशोरावस्था 12 वर्ष से 18 वर्ष तक की अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है | यह वह समय होता है जिसमे व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की और उन्मुख होता है | इस अवस्था में किशोरों की लम्बाई एवं भार दोनों में वृद्धि होती है, साथ ही मांसपेशियों में भी वृद्धि होती है | 12-14 वर्ष की आयु के बीच लडको की अपेक्षा लडकियों की लम्बाई एवं मांसपेशियों में तेजी से वृद्धि होती है एवं 14-18 वर्ष की आयु के बीच लडकियों की अपेक्षा लडको की लम्बाई एवं मांसपेशियां तेजी से बढ़ती है | इस काल में प्रजनन अंग विकसित होने लगते है एवं उनकी काम की मूल प्रव्रत्ति जाग्रत होती है | इस अवस्था में किशोर-किशोरीयो की बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है, उनके ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता बढ़ जाती है, स्मरण शक्ति बढ़ जाती है एवं उनमे स्थायित्व आने लगता है | इस अवस्था में व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्धो में वृद्धि होती है | यौन समस्या इस अवस्था की सबसे बड़ी समस्या होती है | इस अवस्था में नशा या अपराध की और उन्मुख होने की अधिक सम्भावना रहती है, इसलिए इस अवस्था को जीवन के तूफान का काल भी कहा जाता है |

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